
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण के तहत वैशाली जिले में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर प्रशासन सक्रिय नजर आया। इसी कड़ी में लालगंज नगर परिषद क्षेत्र के अगरपुर वार्ड संख्या 13 स्थित आचार्य यज्ञानंद मिश्र के आवास पर जिला प्रशासन की टीम पहुंची, जहां सदियों पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियों का अवलोकन किया गया।


इस दौरान जिलाधिकारी वर्षा सिंह, डीडीसी कुंदन कुमार, नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी कन्हैया कुमार, लालगंज बीडीओ कुमारी किरण एवं सीडीपीओ अलका कुमारी मौजूद रहीं। अधिकारियों ने पांडुलिपियों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और उनके ऐतिहासिक महत्व पर विस्तृत जानकारी ली।
निरीक्षण के दौरान भारत सरकार से सम्मानित उत्तर प्रदेश तत्कालीन रायबरेलीमंडलतर्गत टेकारी राज दरबार के विद्वान आचार्य स्व. सुदामा मिश्र शास्त्री द्वारा रचित हस्तलिखित पांडुलिपियों का गहन अध्ययन किया गया। संस्कृत भाषा में देवनागरी लिपि में लिखी गई इन पांडुलिपियों में धार्मिक एवं वैदिक अनुष्ठानों से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं, जिनमें संकल्प, चतुर्लिङ्गतो भद्र मंडल देवपूजन, पंचांग एवं मंडप प्रवेश, प्रतिष्ठा विधि, श्री भुवनेश्वरी एवं बंगलामुखी पूजा प्रयोग, प्रजापति याग, काली पूजा, वास्तु पूजन,

नवग्रह पूजन, कुशकंडिका होम, विष्णु याग, उपनयन संस्कार, विवाह प्रयोग, नारायण बलि, शैय्यादान समेत आयुर्वेद तक का विस्तृत वर्णन मिलता है।
कार्यक्रम के दौरान जिलाधिकारी वर्षा सिंह ने पांडुलिपियों के संरक्षक एवं आचार्य सुदामा मिश्र शास्त्री के पौत्र आचार्य यज्ञानंद मिश्र को शॉल और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। इस मौके पैर सुदामा मिश्र शास्त्री के पौत्र, राजेश मिश्र, दिवाकर मिश्र, प्रहलाद मिश्र, प्रपौत्र राहुल आदित्य, जय आदित्य आदि लोग

मौजूद रहे। वहीं कार्यपालक पदाधिकारी कन्हैया कुमार ने पौधा भेंट कर जिलाधिकारी का स्वागत किया।
जिलाधिकारी ने कहा कि “ऐसी पांडुलिपियां भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं, जिनका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।” उन्होंने आम लोगों से अपील की कि यदि उनके पास भी कोई पुरानी पांडुलिपि या ग्रंथ सुरक्षित हैं, तो वे इस सर्वेक्षण से जुड़कर देश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में सहयोग करें। इसकी सूचना स्थानीय अधिकारी को हु दें।

यह पहल न केवल विलुप्त होती ज्ञान परंपराओं को संजोने की दिशा में अहम कदम है, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, परंपरा और वैदिक ज्ञान से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी साबित होगी।